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Thursday, September 29, 2011

पगली लड़की

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पगली लड़की "




अमावास की काली रातों में दिल का दरवाजा खुलता है, जब दर्द की प्याली रातों में गम आंसूं के संग होते हैं ,
जब पिछवाड़े के कमरे में हम निपट अकेले होते हैं ,
जब घड़ियाँ टिक -टिक चलती हैं , सब सोते हैं , हम रोते हैं ,
जब बार बार दोहराने से सारी यादें चूक जाती हैं ,
जब उंच -नीच समझाने में माथे की नस दुःख जाती हैं ,
तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है ,
और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है .



जब पोथे खाली होते हैं , जब हर सवाली होते हैं ,
जब ग़ज़लें रास नहीं आतीं , अफसाने गाली होते हैं .
जब बासी फीकी धूप समेटें दिन जल्दी ढल जाता है ,
जब सूरज का लस्कर छत से गलियों में देर से जाता है ,
जब जल्दी घर जाने की इच्छा मन ही मन घुट जाती है ,
जब कॉलेज से घर लाने वाली पहली बस छूट जाती है ,
जब बेमन से खाना खाने पर माँ गुस्सा हो जाती है ,
जब लाख मन करने पर भी पारो पढने आ जाती है ,
जब अपना मनचाहा हर काम कोई लाचारी लगता है ,
तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है ,
और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है .



जब कमरे में सन्नाटे की आवाज सुनाई देती है ,
जब दर्पण में आँखों के नीचे झाई दिखाई देती है ,
जब बडकी भाभी कहती हैं , कुछ सेहत का भी ध्यान करो ,
क्या लिखते हो लल्ला दिनभर , कुछ सपनों का भी सम्मान करो ,
जब बाबा वाली बैठक में कुछ रिश्ते वाले आते हैं ,
जब बाबा हमें बुलाते हैं , हम जाते हैं , घबराते हैं ,
जब सारी पहने एक लड़की का एक फोटो लाया जाता है ,
जब भाभी हमें मानती हैं , फोटो दिखलाया जाता है ,
जब सारे घर का समझाना हमको फनकारी लगता है ,
तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है ,
और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है .



दीदी कहती हैं उस पगली लड़की की कुछ औकात नहीं ,
उसके दिल में भैया तेरे जैसे प्यारे जस्बात नहीं ,
वोह पगली लड़की मेरे लिए नौ दिन भूखी रहती है ,
चुप -चुप सारे व्रत करती है , पर मुझसे कभी न कहती है ,
जो पगली लड़की कहती है , मैं प्यार तुम्ही से करती हूँ ,
लेकिन में हूँ मजबूर बहुत , अम्मा -बाबा से डरती हूँ ,
उस पगली लड़की पर अपना कुछ अधिकार नहीं बाबा ,
यह कथा -कहानी किस्से हैं , कुछ भी तो सार नहीं बाबा ,
बस उस पगली लड़की के संग जीना फुलवारी लगता है ,
और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है

नर हो न निराश करो मन को

नर हो न निराश करो मन को

कुछ काम करो कुछ काम करो


जग में रह के निज नाम करो।

यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो!
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो।
कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर हो न निराश करो मन को।

सँभलो कि सुयोग न जाए चला


कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला!
समझो जग को न निरा सपना
पथ आप प्रशस्त करो अपना।
अखिलेश्वर है अवलम्बन को
नर हो न निराश करो मन को।।

जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ


फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ!
तुम स्वत्त्व सुधा रस पान करो
उठ के अमरत्व विधान करो।
दवरूप रहो भव कानन को
नर हो न निराश करो मन को।।

निज गौरव का नित ज्ञान रहे


हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे।
सब जाय अभी पर मान रहे
मरणोत्तर गुंजित गान रहे।
कुछ हो न तजो निज साधन को
नर हो न निराश करो मन को।।

चेतक

रणबीच चौकड़ी भर-भर कर
चेतक बन गया निराला था
राणाप्रताप के घोड़े से
पड़ गया हवा का पाला था

जो तनिक हवा से बाग हिली
लेकर सवार उड जाता था
राणा की पुतली फिरी नहीं
तब तक चेतक मुड जाता था

गिरता न कभी चेतक तन पर
राणाप्रताप का कोड़ा था
वह दौड़ रहा अरिमस्तक पर
वह आसमान का घोड़ा था

था यहीं रहा अब यहाँ नहीं
वह वहीं रहा था यहाँ नहीं
थी जगह न कोई जहाँ नहीं
किस अरि मस्तक पर कहाँ नहीं

निर्भीक गया वह ढालों में
सरपट दौडा करबालों में
फँस गया शत्रु की चालों में

बढते नद सा वह लहर गया
फिर गया गया फिर ठहर गया
बिकराल बज्रमय बादल सा
अरि की सेना पर घहर गया।

भाला गिर गया गिरा निशंग
हय टापों से खन गया अंग
बैरी समाज रह गया दंग
घोड़े का ऐसा देख रंग

मोको कहां ढूढे रे बन्दे

मोको कहां ढूढे रे बन्दे

-

कबीर (Kabir)

- English translation by Rabindranath Tagore

मोको कहां ढूढे रे बन्दे

मैं तो तेरे पास में

ना तीर्थ मे ना मूर्त में

ना एकान्त निवास में

ना मंदिर में ना मस्जिद में

ना काबे कैलास में

मैं तो तेरे पास में बन्दे

मैं तो तेरे पास में

ना मैं जप में ना मैं तप में

ना मैं बरत उपास में

ना मैं किर्या कर्म में रहता

नहिं जोग सन्यास में

नहिं प्राण में नहिं पिंड में

ना ब्रह्याण्ड आकाश में

ना मैं प्रकति प्रवार गुफा में

नहिं स्वांसों की स्वांस में

खोजि होए तुरत मिल जाउं

इक पल की तालाश में

कहत कबीर सुनो भई साधो

मैं तो हूँ विश्वास में

मोको कहां ढूढे रे बन्दे

मैं तो तेरे पास में

बढ़े चलो

बढ़े चलो

-

द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी

वीर तुम बढ़े चलो

धीर तुम बढ़े चलो

साथ में ध्वजा रहे

बाल दल सजा रहे

ध्वज कभी झुके नहीं

दल कभी रुके नहीं

सामने पहाड़ हो

सिंह की दहाड़ हो

तुम निडर

,हटो नहीं

तुम निडर

,डटो वहीं

वीर तुम बढ़े चलो

धीर तुम बढ़े चलो

प्रात हो कि रात हो

संग हो न साथ हो

सूर्य से बढ़े चलो

चन्द्र से बढ़े चलो

वीर तुम बढ़े चलो

धीर तुम बढ़े चलो

हम होंगे कामयाब,

हम होंगे कामयाब

,

हम होंगे कामयाब एक दिन

हो हो हो मन मे है विश्वास

, पूरा है विश्वास

हम होंगे कामयाब एक दिन

हम चलेंगे साथ

-साथ

डाल हाथों में हाथ

हम चलेंगे साथ

-साथ एक दिन

मन में है विश्वास

, पूरा है विश्वास

हम चलेंगे साथ

-साथ एक दिन

होंगी शांति चारो ओर

होंगी शांति चारो ओर एक दिन

मन में है विश्वास

, पूरा है विश्वास

होंगी शांति चारो ओर एक दिन

नहीं डर किसी का आज

नहीं डर किसी का आज एक दिन

मन में है विश्वास

, पूरा है विश्वास

नहीं डर किसी का आज एक दिन

हो हो हो मन में है विश्वास

, पूरा है विश्वास

हम होंगे कामयाब एक दिन

सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्तां हमारा

सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्तां हमारा

-

मुहम्मद इक़बाल (Muhammad Iqbal)

On the eve of Independence day, here goes the complete 'saare jahan se achha' song by Iqbal. This song is very popular in India - though typically only a subset of the song is sung (with 1st, 3rd, 4th, and 6th stanza).

सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्तां हमारा

हम बुलबुलें हैं इसकी, यह गुलिसतां हमारा

गुरबत में हों अगर हम, रहता है दिल वतन में

समझो वहीं हमें भी, दिल हो जहाँ हमारा

परबत वो सबसे ऊँचा, हमसाया आसमाँ का

वो संतरी हमारा, वो पासवां हमारा

गोदी में खेलती हैं, जिसकी हज़ारों नदियाँ

गुलशन है जिसके दम से, रश्क-ए-जिनां हमारा

ऐ आब-ए-रौंद-ए-गंगा! वो दिन है याद तुझको

उतरा तेरे किनारे, जब कारवां हमारा

मजहब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना

हिन्दी हैं हम वतन हैं, हिन्दोस्तां हमारा

यूनान, मिस्र, रोमां, सब मिट गए जहाँ से ।

अब तक मगर है बाकी, नाम-ओ-निशां हमारा

कुछ बात है कि हस्ती, मिटती नहीं हमारी

सदियों रहा है दुश्मन, दौर-ए-जहाँ हमारा

'

इक़बाल' कोई मरहूम, अपना नहीं जहाँ में

मालूम क्या किसी को, दर्द-ए-निहां हमारा

सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्तां हमारा

हम बुलबुलें हैं इसकी, यह गुलिसतां हमारा ।

कृष्ण की चेतावनी

कृष्ण की चेतावनी



वर्षों तक वन में घूम-घूम,
बाधा-विघ्नों को चूम-चूम,
सह धूप-घाम, पानी-पत्थर,
पांडव आये कुछ और निखर।
सौभाग्य न सब दिन सोता है,
देखें, आगे क्या होता है।

मैत्री की राह बताने को,
सबको सुमार्ग पर लाने को,
दुर्योधन को समझाने को,
भीषण विध्वंस बचाने को,
भगवान् हस्तिनापुर आये,
पांडव का संदेशा लाये।

'दो न्याय अगर तो आधा दो,
पर, इसमें भी यदि बाधा हो,
तो दे दो केवल पाँच ग्राम,
रक्खो अपनी धरती तमाम।
हम वहीं खुशी से खायेंगे,
परिजन पर असि न उठायेंगे!

दुर्योधन वह भी दे ना सका,
आशिष समाज की ले न सका,
उलटे, हरि को बाँधने चला,
जो था असाध्य, साधने चला।
जन नाश मनुज पर छाता है,
पहले विवेक मर जाता है।

हरि ने भीषण हुंकार किया,
अपना स्वरूप-विस्तार किया,
डगमग-डगमग दिग्गज डोले,
भगवान् कुपित होकर बोले-
'जंजीर बढ़ा कर साध मुझे,
हाँ, हाँ दुर्योधन! बाँध मुझे।

यह देख, गगन मुझमें लय है,
यह देख, पवन मुझमें लय है,
मुझमें विलीन झंकार सकल,
मुझमें लय है संसार सकल।
अमरत्व फूलता है मुझमें,
संहार झूलता है मुझमें।

'उदयाचल मेरा दीप्त भाल,
भूमंडल वक्षस्थल विशाल,
भुज परिधि-बन्ध को घेरे हैं,
मैनाक-मेरु पग मेरे हैं।
दिपते जो ग्रह नक्षत्र निकर,
सब हैं मेरे मुख के अन्दर।

'दृग हों तो दृश्य अकाण्ड देख,
मुझमें सारा ब्रह्माण्ड देख,
चर-अचर जीव, जग, क्षर-अक्षर,
नश्वर मनुष्य सुरजाति अमर।
शत कोटि सूर्य, शत कोटि चन्द्र,
शत कोटि सरित, सर, सिन्धु मन्द्र।

'शत कोटि विष्णु, ब्रह्मा, महेश,
शत कोटि विष्णु जलपति, धनेश,
शत कोटि रुद्र, शत कोटि काल,
शत कोटि दण्डधर लोकपाल।
जञ्जीर बढ़ाकर साध इन्हें,
हाँ-हाँ दुर्योधन! बाँध इन्हें।

'भूलोक, अतल, पाताल देख,
गत और अनागत काल देख,
यह देख जगत का आदि-सृजन,
यह देख, महाभारत का रण,
मृतकों से पटी हुई भू है,
पहचान, इसमें कहाँ तू है।

'अम्बर में कुन्तल-जाल देख,
पद के नीचे पाताल देख,
मुट्ठी में तीनों काल देख,
मेरा स्वरूप विकराल देख।
सब जन्म मुझी से पाते हैं,
फिर लौट मुझी में आते हैं।

'जिह्वा से कढ़ती ज्वाल सघन,
साँसों में पाता जन्म पवन,
पड़ जाती मेरी दृष्टि जिधर,
हँसने लगती है सृष्टि उधर!
मैं जभी मूँदता हूँ लोचन,
छा जाता चारों ओर मरण।

'बाँधने मुझे तो आया है,
जंजीर बड़ी क्या लाया है?
यदि मुझे बाँधना चाहे मन,
पहले तो बाँध अनन्त गगन।
सूने को साध न सकता है,
वह मुझे बाँध कब सकता है?

'हित-वचन नहीं तूने माना,
मैत्री का मूल्य न पहचाना,
तो ले, मैं भी अब जाता हूँ,
अन्तिम संकल्प सुनाता हूँ।
याचना नहीं, अब रण होगा,
जीवन-जय या कि मरण होगा।

'टकरायेंगे नक्षत्र-निकर,
बरसेगी भू पर वह्नि प्रखर,
फण शेषनाग का डोलेगा,
विकराल काल मुँह खोलेगा।
दुर्योधन! रण ऐसा होगा।
फिर कभी नहीं जैसा होगा।

'भाई पर भाई टूटेंगे,
विष-बाण बूँद-से छूटेंगे,
वायस-श्रृगाल सुख लूटेंगे,
सौभाग्य मनुज के फूटेंगे।
आखिर तू भूशायी होगा,
हिंसा का पर, दायी होगा।'

थी सभा सन्न, सब लोग डरे,
चुप थे या थे बेहोश पड़े।
केवल दो नर ना अघाते थे,
धृतराष्ट्र-विदुर सुख पाते थे।
कर जोड़ खड़े प्रमुदित,
निर्भय, दोनों पुकारते थे 'जय-जय'!